उन पेड़ों की शाखों पर कुछ यादें रहती हैं
वो बचपन की खूशबू हवाओं में बहती है
न पाने की चिंता न खोने का ग़म
बस मस्ती का नाच, खुशी की सरगम
वो सावन की बारिश की भीगी उमंगें
उमंगों भरी वो रंगीन पतंगें
हाथों पे मांझे की लंबी लकीरें
वो लकीरें भी बचपन की कुछ बातें कहतीं हैं
उन पेड़ों की शाखों पर कुछ यादें रहतीं हैं
चवन्नी की कंप्पट, अठ्न्नी का कोला
खट्टी सी इमली वो ठंडा सा गोला
वो चिल्लाता हंसता दोस्तों का टोला
मम्मी की अल्मारी में खिलौनों का झोला
अल्मारी में बन्द एक हंसी रहती है
उन पेड़ों की शाखों पर कुछ यादें रहतीं हैं
छोटे से पावों की लम्बी सी दौड़ें
सकरी सी गलियों की अंधी मोड़ें
गलियों के गड्ढे और गिट्टी के रोड़े
वो शामों को चाची के चाय पकौड़े
वो चाची मगर अब अकेली रहतीं हैं
उन पेड़ों की शाखों पर कुछ यादें रहतीं हैं
वो जामुन के पेड़ों पर फ़ुर्ती से चढ़ना
वो कंकड़ के मारे से अमिया का गिरना
वो मीठे से बेर, बेरों के काँटे
वो काँटों के घावों पे मम्मी के चाँटे
गालों पर अब भी चाँटों की गर्मी रहती है
उन पेड़ों की शाखों पर कुछ यादें रहतीं हैं
दिल मे बसे वो बचपन के साये
न मिटते मिटेंगे किसी के मिटाये
जियो फ़िर वैसे ही ये कहती रहतीं हैं
उन पेड़ों की शाखों पर कुछ यादें रहतीं हैं....
GAURAV TRIPATHI
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